शिक्षा व्यवस्था का सवाल: जंतर-मंतर का आंदोलन और सुधार की अनिवार्यता
देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर नीट से जुड़े विवादों और कथित पेपर लीक की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही की मांग का प्रतीक हैं। लेख में परीक्षा सुरक्षा, स्वतंत्र जांच, कठोर दंड, आधुनिक तकनीक और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था जैसे सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। साथ ही कहा गया है कि शिक्षा को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठाकर राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया जाना चाहिए।
डॉक्टर इंदर सिंह केवट
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस भोपाल मध्य प्रदेश
परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और छात्रों का भरोसा बहाल करना समय की सबसे बड़ी जरूरत
भोपाल भारत युवा शक्ति का देश है। यहां करोड़ों विद्यार्थियों के सपने प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ते हैं। जब इन्हीं परीक्षाओं की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगने लगें, तब यह केवल परीक्षा का संकट नहीं रहता, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है। हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर नीट परीक्षा से जुड़े विवादों, कथित पेपर लीक की घटनाओं और पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों ने छात्रों के बीच असंतोष को जन्म दिया है। यही असंतोष समय-समय पर नई दिल्ली के जंतर-मंतर जैसे लोकतांत्रिक मंचों पर आंदोलनों के रूप में दिखाई देता है।
इन आंदोलनों में छात्रों ने परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई, जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की मांग उठाई है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस हुई है। लोकतंत्र में किसी भी मंत्री या सरकार से जवाबदेही की अपेक्षा स्वाभाविक है, वहीं यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी निष्कर्ष का आधार जांच, तथ्य और संवैधानिक प्रक्रिया हो, न कि केवल जनभावनाएं।
इसी संदर्भ में शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा शिक्षा, युवाओं और व्यापक जनहित के मुद्दों पर किए जा रहे शांतिपूर्ण आंदोलन और अनशन ने भी राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। उनका संदेश यह है कि शासन और समाज के बीच संवाद निरंतर बना रहना चाहिए तथा नीतियों का उद्देश्य नागरिकों का विश्वास अर्जित करना होना चाहिए।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इसलिए छात्र आंदोलन लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा हैं। किंतु आंदोलनों की प्रभावशीलता तब और बढ़ जाती है जब उनके साथ ठोस सुझाव, रचनात्मक संवाद और संस्थागत सुधार की स्पष्ट रूपरेखा भी जुड़ी हो। दूसरी ओर सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि छात्रों के मन में परीक्षा प्रणाली के प्रति विश्वास बना रहे।
आज आवश्यकता केवल पेपर लीक रोकने तक सीमित नहीं है। परीक्षा संचालन में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग, प्रश्नपत्रों की बहुस्तरीय सुरक्षा, परीक्षा एजेंसियों की स्वतंत्रता, समयबद्ध जांच, दोषियों को कठोर दंड, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया तथा छात्रों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र विकसित करना समय की मांग है। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास तभी लौटेगा जब ईमानदार विद्यार्थियों को यह भरोसा होगा कि उनकी मेहनत का मूल्य किसी अनियमितता से प्रभावित नहीं होगा।
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है। यदि युवा वर्ग का विश्वास शिक्षा व्यवस्था से डगमगाता है, तो उसका प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक विश्वास, आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी पड़ता है। इसलिए यह विषय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय प्राथमिकता बनना चाहिए
जंतर-मंतर पर उठ रही आवाज़ें केवल विरोध की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और सुधार की मांग का प्रतीक हैं। सरकार, विपक्ष, शिक्षा विशेषज्ञ, परीक्षा एजेंसियां और छात्र—सभी की साझा जिम्मेदारी है कि शिक्षा को राजनीति का विषय बनाने के बजाय राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया जाए। जब संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही साथ-साथ आगे बढ़ेंगे, तभी भारत की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में विश्वसनीय, न्यायपूर्ण और भविष्य उन्मुख बन सकेगी।
इंदर सिंह केवट स्वतंत्र (लेखक )
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस