मिनी ट्रक भर फाइलें लेकर हाईकोर्ट पहुंचा नगर निगम, 5 साल की सड़कों का हिसाब तलब

सुनवाई के दौरान रिकार्ड की सूची से एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। नगर निगम ने तीनों शहरी विधानसभा क्षेत्रों में कराए गए सड़क निर्माण और मरम्मत कार्यों का विवरण प्रस्तुत किया।

मिनी ट्रक भर फाइलें लेकर हाईकोर्ट पहुंचा नगर निगम, 5 साल की सड़कों का हिसाब तलब

ग्वालियर की बदहाल सड़कों को लेकर हाईकोर्ट ने नगर निगम से वर्ष 2021 से 2026 तक सड़क निर्माण और खर्च का रिकॉर्ड तलब किया। निगम मिनी ट्रक में फाइलें लेकर कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने तीन वकीलों की कमेटी गठित कर सड़कों की गुणवत्ता और निर्माण मानकों की जांच के निर्देश दिए। 

ग्वालियर। शहर की बदहाल सड़कों को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने नगर निगम के प्रति सख्त रुख अपनाया है। शहर की सड़कों पर निर्माण, मरम्मत और पैचवर्क के नाम पर पिछले पांच वर्षों में किए गए कार्यों का पूरा रिकॉर्ड अदालत ने तलब किया था। गुरुवार को नगर निगम के अधिकारी जब इस रिकॉर्ड को लेकर हाईकोर्ट पहुंचे तो बड़ी संख्या में फाइलें देखकर हर कोई हैरान रह गया। निगम को दस्तावेजों के लिए एक मिनी ट्रक का सहारा लेना पड़ा।

मामला केवल फाइलों और दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहा। हाईकोर्ट ने अब नगर निगम की ओर से रिकॉर्ड में किए गए दावों की जमीनी हकीकत जांचने का फैसला किया है। इसके लिए तीन वरिष्ठ वकीलों की विशेष जांच कमिटी गठित की गई है। यह कमिटी निगम द्वारा बताए गए स्थानों पर पहुंचकर सड़कों और किए गए निर्माण कार्यों का मौके पर निरीक्षण करेगी।

पांच साल में सड़क पर कितना काम हुआ?

हाईकोर्ट ने नगर निगम से वर्ष 2021 से 2026 के बीच शहर की सड़कों पर कराए गए निर्माण, मरम्मत, पैचवर्क और अन्य कार्यों का विस्तृत हिसाब मांगा था। निगम को यह बताना था कि किस सड़क पर कब काम हुआ, कितना बजट खर्च किया गया और किस एजेंसी या ठेकेदार के माध्यम से कार्य कराया गया।

अदालत के निर्देश के बाद नगर निगम ने बड़ी संख्या में दस्तावेज और फाइलें तैयार कीं। गुरुवार को अधिकारी इन रिकॉर्ड को लेकर हाईकोर्ट पहुंचे। फाइलों की संख्या इतनी अधिक थी कि उन्हें मिनी ट्रक में लादकर लाना पड़ा।

अब अदालत इन दस्तावेजों में दर्ज जानकारी को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखना चाहती। यही वजह है कि मौके पर जाकर रिकॉर्ड में दर्ज कार्यों की वास्तविक स्थिति जांचने की तैयारी की गई है।

दस्तावेजों में सड़क बनी, तो जमीन पर भी दिखनी चाहिए

हाईकोर्ट द्वारा गठित तीन वरिष्ठ वकीलों की विशेष जांच कमिटी नगर निगम द्वारा बताए गए स्थानों पर जाएगी। कमिटी यह जांच करेगी कि जिन सड़कों के निर्माण या मरम्मत का दावा निगम के रिकॉर्ड में किया गया है, क्या वास्तव में वहां काम हुआ है।

इसके साथ ही सड़क की स्थिति, मरम्मत की गुणवत्ता और रिकॉर्ड में दर्ज कार्य के बीच समानता भी जांच के दायरे में आ सकती है। यदि किसी सड़क पर कागजों में काम पूरा दिखाया गया है, लेकिन मौके पर स्थिति अलग मिलती है तो यह नगर निगम के लिए गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।

129 सड़कों पर हाईकोर्ट की नजर

शहर की खराब सड़कों को लेकर दायर याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 129 सड़कों को लेकर रिपोर्ट मांगी थी। नगर निगम की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट में बताया गया कि इन 129 सड़कों में से केवल 62 सड़कें ही ऐसी थीं जिन्हें चलने लायक माना गया।

यानी रिपोर्ट के अनुसार बड़ी संख्या में सड़कें ऐसी थीं जिनकी स्थिति संतोषजनक नहीं थी। इसी स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और नगर निगम से विस्तृत रिकॉर्ड मांगा।

सड़कों की स्थिति को लेकर लंबे समय से शहरवासियों की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। बारिश के मौसम में कई इलाकों में सड़कें गड्ढों में बदल जाती हैं। कहीं सड़क धंसने की समस्या सामने आती है तो कहीं पैचवर्क के कुछ समय बाद ही सड़क फिर खराब हो जाती है।

अब कागज नहीं, मौके पर होगी पड़ताल

हाईकोर्ट के इस कदम का सबसे अहम पहलू यह है कि अब नगर निगम के दस्तावेजों में दर्ज दावों का मौके पर सत्यापन किया जाएगा। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि पिछले पांच वर्षों में सड़क निर्माण और मरम्मत के नाम पर किए गए कार्य वास्तव में जमीन पर कितने प्रभावी रहे।

जांच कमिटी निगम द्वारा उपलब्ध कराए गए रिकॉर्ड के आधार पर संबंधित स्थानों का निरीक्षण करेगी। इस दौरान सड़क की मौजूदा स्थिति और निगम के रिकॉर्ड में दर्ज कार्यों के बीच अंतर को देखा जाएगा।

अगर किसी सड़क के लिए रिकॉर्ड में निर्माण या मरम्मत का दावा किया गया है, लेकिन मौके पर काम दिखाई नहीं देता या सड़क की हालत बेहद खराब मिलती है, तो संबंधित रिकॉर्ड और कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सड़क निर्माण की गुणवत्ता भी बड़ा सवाल

ग्वालियर में सड़कों की गुणवत्ता को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। कई जगह सड़क बनने के बाद कम समय में ही उसमें गड्ढे दिखाई देने लगते हैं। बारिश के दौरान स्थिति और खराब हो जाती है। कुछ इलाकों में सड़क धंसने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।

शहर की आबादी और यातायात को देखते हुए सड़कों की खराब स्थिति लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है। वाहन चालकों को गड्ढों से बचकर निकलना पड़ता है, वहीं बारिश में जलभराव के कारण सड़क की वास्तविक स्थिति पहचानना भी मुश्किल हो जाता है।

ऐसे में हाईकोर्ट द्वारा रिकॉर्ड की जांच और उसके बाद मौके पर निरीक्षण का निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

निगम के सामने जवाबदेही की चुनौती

मिनी ट्रक में भरकर फाइलों का हाईकोर्ट पहुंचना इस मामले की गंभीरता को भी दर्शाता है। अब नगर निगम को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि किस सड़क पर कितना पैसा खर्च किया गया और कौन सा काम कराया गया। अदालत की निगरानी में यह भी देखा जाएगा कि उन दावों की वास्तविकता जमीन पर क्या है।

पांच साल के कार्यों का रिकॉर्ड सामने आने के बाद अब संबंधित सड़कों का भौतिक सत्यापन होने से तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि सड़क निर्माण और मरम्मत के लिए खर्च किए गए सरकारी धन का इस्तेमाल किस तरह हुआ और उससे शहर की सड़कों को वास्तविक लाभ कितना मिला।

फिलहाल हाईकोर्ट की सख्ती के बाद नगर निगम के लिए सड़क संबंधी अपने दावों और रिकॉर्ड को लेकर जवाबदेही तय करने की चुनौती बढ़ गई है। आने वाले समय में जांच कमिटी की मौके पर पड़ताल इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

शहरवासियों की नजर भी अब इस जांच पर है। लोगों को उम्मीद है कि कागजों में दर्ज विकास कार्यों और जमीन पर मौजूद सड़कों की वास्तविक स्थिति के बीच यदि कोई अंतर है, तो वह सामने आएगा और खराब सड़कों की समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।