"‘वोकल फॉर लोकल’ की सबसे बड़ी मिसाल बना कांवड़ निर्माण उद्योग, लाखों कारीगरों और छोटे व्यापारियों की आजीविका का सशक्त आधार" — प्रवीन खंडेलवाल

सावन में निकलने वाली कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कुटीर उद्योग को मजबूती देने वाला बड़ा आर्थिक अभियान भी है। कैट के अनुसार कांवड़ और उससे जुड़ी सामग्री का मौसमी कारोबार करीब 5 हजार करोड़ रुपये का है, जिससे 1 से 2 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। संगठन ने कांवड़ निर्माण उद्योग को 'वोकल फॉर लोकल' का जीवंत उदाहरण बताते हुए कारीगरों को आधुनिक सुविधाएं और सरकारी सहयोग देने की मांग की है।

"‘वोकल फॉर लोकल’ की सबसे बड़ी मिसाल बना कांवड़ निर्माण उद्योग, लाखों कारीगरों और छोटे व्यापारियों की आजीविका का सशक्त आधार" — प्रवीन खंडेलवाल

सावन की कांवड़: आस्था का उत्सव, लाखों हाथों को रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई शक्ति

'वोकल फॉर लोकल' का जीवंत उदाहरण बना कांवड़ निर्माण उद्योग, लगभग 5 हजार करोड़ रुपये का मौसमी कारोबार

नई दिल्ली। सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना, भक्ति और आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। देशभर में लाखों शिवभक्त कांवड़ यात्रा निकालकर पवित्र नदियों से जल लाते हैं और शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। लेकिन यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कुटीर उद्योग, पारंपरिक हस्तशिल्प और छोटे व्यापारियों के लिए भी एक बड़ा आर्थिक अवसर बन चुकी है। कांवड़ यात्रा के दौरान बनने, बिकने और उपयोग होने वाली सामग्री से जुड़े लाखों लोगों को रोजगार मिलता है तथा हजारों करोड़ रुपये का मौसमी कारोबार होता है।

दिल्ली के चांदनी चौक से सांसद एवं कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि कांवड़ निर्माण उद्योग आज भारत के सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक कुटीर उद्योगों में शामिल हो चुका है। यह उद्योग न केवल लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'वोकल फॉर लोकल', 'लोकल टू ग्लोबल', 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' जैसे अभियानों को भी जमीनी स्तर पर मजबूत करता है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड सरकार के आंकड़ों के अनुसार हाल के वर्षों में हरिद्वार कांवड़ यात्रा में लगभग 4.5 करोड़ श्रद्धालु शामिल हुए हैं। वहीं झारखंड सरकार के अनुसार देवघर के विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में हर वर्ष 50 से 55 लाख श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं। इन दोनों बड़े धार्मिक आयोजनों के कारण देशभर में लाखों कांवड़ों की मांग पैदा होती है, जिससे एक विशाल उत्पादन और व्यापारिक श्रृंखला सक्रिय हो जाती है।

खंडेलवाल ने बताया कि कांवड़ निर्माण मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड के ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में संचालित होने वाला पारंपरिक कुटीर उद्योग है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का नजीबाबाद, हरिद्वार का ज्वालापुर, मेरठ, बागपत, सहारनपुर सहित कई क्षेत्र वर्षों से कांवड़ निर्माण के प्रमुख केंद्र रहे हैं। यहां हजारों कारीगर परिवार पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं।

उन्होंने बताया कि केवल नजीबाबाद के प्रमुख कांवड़ निर्माण क्लस्टर में ही 500 से अधिक कारीगर प्रतिवर्ष लगभग 2 से 2.5 लाख कांवड़ों का निर्माण करते हैं। इसी प्रकार झारखंड के देवघर, जसीडीह, मधुपुर, दुमका और संताल परगना क्षेत्र में भी हजारों कारीगर श्रावणी मेले की मांग को पूरा करने के लिए लाखों कांवड़ तथा धार्मिक सामग्री तैयार करते हैं। इन क्षेत्रों में सावन का महीना कारीगरों के लिए सबसे व्यस्त और सबसे अधिक आय वाला समय माना जाता है।

कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया ने कहा कि कांवड़ केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह अनेक उद्योगों और व्यवसायों को जोड़ने वाली आर्थिक श्रृंखला का केंद्र है। इसके निर्माण में बांस, लकड़ी, रंगीन कागज, कपड़ा, प्लास्टिक सामग्री, सजावटी झंडे, धार्मिक प्रतीक, मोती, एलईडी लाइट, रंग, गोंद और अन्य हस्तशिल्प सामग्री का उपयोग किया जाता है। इससे बांस उत्पादकों, कागज उद्योग, कपड़ा कारोबार, सजावटी सामग्री निर्माताओं, इलेक्ट्रिकल उत्पाद विक्रेताओं, परिवहन क्षेत्र और छोटे व्यापारियों को भी व्यापक व्यापारिक अवसर प्राप्त होते हैं।

उन्होंने बताया कि बाजार में उपलब्ध साधारण कांवड़ की कीमत लगभग 100 से 500 रुपये तक होती है, जबकि आकर्षक सजावट, आधुनिक डिजाइन और एलईडी लाइटों से सुसज्जित विशेष कांवड़ों की कीमत 5 हजार रुपये या उससे अधिक तक पहुंच जाती है। इससे कारीगरों को बेहतर आय मिलती है और सावन के दौरान एक बड़ा मौसमी बाजार तैयार होता है। कैट के अनुमान के अनुसार कांवड़ और उससे संबंधित धार्मिक सामग्री का कुल मौसमी कारोबार लगभग 5 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।

कैट के राष्ट्रीय चेयरमैन ब्रजमोहन अग्रवाल ने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल निर्माण उद्योग तक सीमित नहीं है। इसके साथ परिवहन, धार्मिक सामग्री, भोजनालय, होटल, धर्मशाला, अस्थायी बाजार, वस्त्र, फल, पेय पदार्थ, चिकित्सा सेवाएं, टेंट, ध्वनि व्यवस्था, सुरक्षा सामग्री और अन्य सहायक गतिविधियां भी तेजी से बढ़ती हैं। यात्रा मार्गों पर हजारों रेहड़ी-पटरी विक्रेता, छोटे दुकानदार, हस्तशिल्पी, वाहन चालक और सेवा प्रदाता अपनी आजीविका अर्जित करते हैं। उनके अनुसार यह पूरा आर्थिक तंत्र प्रतिवर्ष एक से दो लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से मौसमी रोजगार उपलब्ध कराता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कांवड़ निर्माण उद्योग ग्रामीण भारत की आत्मनिर्भरता का मजबूत उदाहरण है। अधिकांश कांवड़ स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक तकनीकों से तैयार की जाती हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। बड़ी संख्या में महिलाएं भी सजावट, पैकिंग और हस्तशिल्प कार्यों के माध्यम से इस उद्योग से जुड़कर अपनी आय बढ़ा रही हैं।

प्रवीन खंडेलवाल ने सरकारों से आग्रह किया कि कांवड़ निर्माण से जुड़े कारीगरों को आधुनिक डिजाइन, वित्तीय सहायता, सस्ती ऋण सुविधा, तकनीकी प्रशिक्षण, कौशल विकास, ब्रांडिंग, विपणन और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए। यदि इस पारंपरिक उद्योग को संगठित रूप से विकसित किया जाए तो यह न केवल घरेलू बाजार में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्पादों की पहचान को मजबूत कर सकता है।

उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक परंपराएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे रोजगार, व्यापार, उद्यमिता और आर्थिक विकास की भी मजबूत आधारशिला हैं। कांवड़ यात्रा इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जहां श्रद्धा और अर्थव्यवस्था एक साथ आगे बढ़ती हैं। लाखों श्रद्धालुओं की आस्था जहां धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखती है, वहीं लाखों कारीगरों, व्यापारियों और छोटे उद्यमियों के लिए यह पर्व आजीविका और आर्थिक समृद्धि का महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।

सावन का यह पावन पर्व देश को यह संदेश भी देता है कि जब स्थानीय कौशल, पारंपरिक उद्योग और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा मिलता है, तब केवल आस्था ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है। यही कारण है कि कांवड़ निर्माण उद्योग आज भारत के 'वोकल फॉर लोकल' अभियान का सशक्त और प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभर रहा है।