मुख्यमंत्री के निर्देश बेअसर; दो संतान नियम पर ब्यूरोक्रेसी का अड़ंगा, 25 साल पुराना प्रावधान अब भी कायम

मध्यप्रदेश में दो से अधिक संतान वाले अभ्यर्थियों पर सरकारी नौकरी की रोक से जुड़ा करीब 25 साल पुराना नियम खत्म करने की प्रक्रिया अटक गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इसके प्रावधान हटाने के निर्देश दे चुके हैं, लेकिन GAD अब तक संशोधित प्रस्ताव कैबिनेट में नहीं ला पाया। पूर्व मुख्य सचिव अनुराग जैन के कार्यकाल में वरिष्ठ सचिव समिति ने भी नियम हटाने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी थी। 6 जून के ड्राफ्ट में पाबंदी बरकरार रहने पर CM ने उसे हटाकर नया प्रारूप तैयार करने के निर्देश दिए थे। कर्मचारी संगठन भी नियम खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री के निर्देश बेअसर; दो संतान नियम पर ब्यूरोक्रेसी का अड़ंगा, 25 साल पुराना प्रावधान अब भी कायम

CM के निर्देश के बावजूद दो संतान नियम में बदलाव अटका

25 साल पुराने प्रावधान को खत्म करने का प्रस्ताव कैबिनेट तक नहीं पहुंचा

वरिष्ठ सचिव समिति ने नियम हटाने पर नहीं दी थी मंजूरी

6 जून के ड्राफ्ट में दो से अधिक संतान पर रोक बरकरार

भोपाल। मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरी से जुड़े करीब 25 साल पुराने ‘दो संतान’ नियम को खत्म करने की प्रक्रिया एक बार फिर प्रशासनिक स्तर पर अटकती नजर आ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की ओर से इस प्रावधान को हटाने के निर्देश दिए जाने के बावजूद सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) अब तक इसका संशोधित प्रस्ताव कैबिनेट के सामने नहीं ला पाया है। इससे मुख्यमंत्री की मंशा और ब्यूरोक्रेसी के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

मौजूदा प्रावधान के तहत दो से अधिक संतान वाले लोगों को सरकारी नौकरी की सीधी भर्ती में अपात्र माना जाता है। वहीं, मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम-1965 के तहत भी दो से अधिक बच्चों से जुड़े प्रावधान लागू हैं। कर्मचारी संगठनों का लंबे समय से कहना है कि बदलते सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों को देखते हुए इस नियम की समीक्षा की जानी चाहिए।

मुख्यमंत्री ने नियम हटाने के दिए थे निर्देश

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस प्रतिबंध को हटाने की मंशा पहले ही स्पष्ट कर दी थी। करीब एक माह पहले उन्होंने अधिकारियों को इस दिशा में कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए थे। इसके बावजूद अब तक न तो संशोधित नियम लागू हुआ और न ही प्रस्ताव कैबिनेट की मंजूरी के लिए पहुंचा है।

मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यमंत्री की ओर से निर्देश दिए जाने के बाद सामान्य प्रशासन विभाग को नियम में बदलाव का प्रस्ताव तैयार करना था। लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, प्रस्ताव को पहले वरिष्ठ सचिव समिति के स्तर पर चर्चा के लिए रखा गया था, जहां इसे मंजूरी नहीं मिल सकी।

पूर्व मुख्य सचिव के कार्यकाल में भी हुई थी चर्चा

इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू पूर्व मुख्य सचिव अनुराग जैन के कार्यकाल से जुड़ा है। उनके कार्यकाल में मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप दो संतान संबंधी प्रावधान को खत्म करने का प्रस्ताव वरिष्ठ सचिव समिति की बैठक में रखा गया था।

बताया जा रहा है कि अनुराग जैन इस नियम को समाप्त करने के पक्ष में थे। हालांकि वरिष्ठ सचिव समिति में प्रस्ताव पर सदस्यों की सहमति नहीं बन पाई। समिति से मंजूरी नहीं मिलने के कारण प्रस्ताव आगे कैबिनेट तक नहीं पहुंच सका।

अब अनुराग जैन के दिल्ली जाने के बाद इस मामले को लेकर फिर चर्चा शुरू हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि जब मुख्यमंत्री स्वयं नियम को हटाने के निर्देश दे चुके हैं तो प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ रही है।

कर्मचारी संगठनों ने लंबे समय से उठाई आवाज

दो से अधिक संतान होने पर सरकारी नौकरी से जुड़े प्रतिबंध का कर्मचारी संगठन लगातार विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क है कि किसी कर्मचारी या अभ्यर्थी की पारिवारिक स्थिति को आधार बनाकर उसके रोजगार के अवसर सीमित करना मौजूदा परिस्थितियों में उचित नहीं है।

राज्य कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री जितेंद्र सिंह ने भी इस मुद्दे पर सरकार से नियम खत्म करने की मांग की है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री स्पष्ट रूप से इस प्रावधान को निरस्त करने की बात कह चुके हैं, लेकिन विभागीय स्तर पर कार्रवाई में देरी हो रही है।

कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि कई अन्य मामलों में भी मुख्यमंत्री के निर्देशों के बावजूद विभागीय प्रक्रिया धीमी रहती है। उनका कहना है कि यदि सरकार किसी नियम को बदलने का निर्णय ले चुकी है तो अधिकारियों को समयसीमा तय कर प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।

6 जून के ड्राफ्ट में पाबंदी बरकरार थी

इस विवाद की शुरुआत नए नियमों के प्रस्तावित ड्राफ्ट से भी जुड़ी है। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से 6 जून 2026 को प्रकाशित ड्राफ्ट में दो से अधिक संतान की पाबंदी को बरकरार रखा गया था।

प्रस्तावित नियम के नियम 5 और 6 में सरकारी सेवा के लिए पात्रता और अपात्रता की शर्तें निर्धारित की गई थीं। इसके मुताबिक, ऐसा उम्मीदवार जिसकी दो से अधिक संतान हैं और उनमें से किसी एक का जन्म 26 जनवरी 2001 या उसके बाद हुआ है, वह सरकारी नौकरी के लिए पात्र नहीं माना जाएगा।

यानी प्रस्तावित नए ड्राफ्ट में भी मूल रूप से वही प्रतिबंध कायम रखा गया था, जिसे मुख्यमंत्री हटाना चाहते थे। यही वजह रही कि मुख्यमंत्री ने इस प्रारूप पर आपत्ति जताई।

मुख्यमंत्री ने ड्राफ्ट पोर्टल से हटाने के निर्देश दिए

बताया जाता है कि मुख्यमंत्री ने GAD के इस प्रस्तावित ड्राफ्ट को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए थे। उन्होंने दो से अधिक संतान की पाबंदी हटाने और पुराने प्रावधान में बदलाव करने को कहा था।

मुख्यमंत्री ने विभाग को ड्राफ्ट तत्काल पोर्टल से हटाने तथा संशोधित प्रारूप तैयार कर दोबारा प्रकाशित करने के निर्देश दिए थे। लेकिन अब तक संशोधित नियम सार्वजनिक नहीं होने से सवाल उठ रहे हैं कि प्रक्रिया कहां अटकी हुई है।

यदि मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप नियम में बदलाव किया जाता है तो इसका सीधा असर उन अभ्यर्थियों और कर्मचारियों पर पड़ेगा जो मौजूदा दो संतान संबंधी प्रावधान के कारण सरकारी सेवा के लिए अपात्र हो जाते हैं।

जुड़वां बच्चों के लिए था विशेष प्रावधान

6 जून को प्रकाशित प्रस्तावित ड्राफ्ट में कुछ परिस्थितियों में राहत का प्रावधान भी रखा गया था। इसमें जुड़वां बच्चों के मामले को अलग रखा गया था।

नियम के मुताबिक, यदि किसी व्यक्ति का पहले से एक बच्चा है और अगली डिलीवरी में जुड़वां या उससे अधिक बच्चे पैदा होते हैं, तो ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को दो से अधिक संतान होने के आधार पर अपात्र नहीं माना जाना था।

इससे स्पष्ट है कि नियम में कुछ अपवाद पहले से मौजूद थे, लेकिन सामान्य तौर पर दो से अधिक जीवित संतान वाले अभ्यर्थियों पर सरकारी नौकरी को लेकर प्रतिबंध कायम रखा गया था।

2001 में लागू हुआ था प्रावधान

मध्यप्रदेश में दो संतान से जुड़ा यह प्रावधान वर्ष 2001 में लागू किया गया था। इसके तहत 26 जनवरी 2001 या उसके बाद दो से अधिक जीवित संतान वाले उम्मीदवारों को सरकारी नौकरी में सीधी भर्ती और विभागीय नियुक्तियों के लिए अपात्र माना गया।

इस नियम का उद्देश्य उस समय छोटे परिवार की अवधारणा को बढ़ावा देना और जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ी नीति को प्रोत्साहित करना था। लेकिन करीब ढाई दशक बाद कर्मचारी संगठन और कुछ वर्ग इस नियम को बदलने की मांग कर रहे हैं।

समय के साथ परिवार नियोजन, रोजगार के अवसर और सरकारी सेवा से जुड़े नियमों को लेकर परिस्थितियां बदली हैं। ऐसे में इस पुराने प्रावधान की प्रासंगिकता को लेकर भी बहस तेज हुई है।

आचरण नियमों में भी दो से अधिक बच्चों का प्रावधान

मामला केवल भर्ती नियमों तक सीमित नहीं है। मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम-1965 में भी दो से अधिक बच्चों से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। दो से अधिक बच्चों को लेकर कर्मचारी आचरण से जुड़ी शर्तें लागू होती हैं।

ऐसे में यदि सरकार दो संतान संबंधी प्रतिबंध को पूरी तरह हटाना चाहती है तो केवल भर्ती नियम में बदलाव करना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित सेवा और आचरण नियमों में भी आवश्यक संशोधन करने पड़ सकते हैं।

यही वजह है कि इस मामले में प्रशासनिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है। नियमों में बदलाव के लिए विभागीय परीक्षण, वरिष्ठ सचिव समिति की चर्चा और जरूरत पड़ने पर कैबिनेट की मंजूरी जैसी प्रक्रियाओं को पूरा करना होगा।

कैबिनेट तक प्रस्ताव नहीं पहुंचना बना बड़ा सवाल

सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री की स्पष्ट मंशा के बावजूद प्रस्ताव अब तक कैबिनेट के सामने क्यों नहीं पहुंचा। यदि वरिष्ठ सचिव समिति में पहले प्रस्ताव पर सहमति नहीं बनी थी, तो मुख्यमंत्री के नए निर्देशों के बाद संशोधित प्रस्ताव तैयार कर दोबारा प्रक्रिया शुरू की जा सकती थी।

लेकिन फिलहाल मामला आगे नहीं बढ़ पाया है। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या ब्यूरोक्रेसी इस बदलाव को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं है या फिर नियमों में संशोधन की प्रक्रिया कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर अधिक जटिल है।

सरकार की ओर से इस मामले में अंतिम निर्णय आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

आगे क्या होगा?

अब निगाहें सामान्य प्रशासन विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि GAD मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप संशोधित प्रस्ताव तैयार करता है तो उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके बाद कैबिनेट की मंजूरी मिलने पर संबंधित नियमों में औपचारिक संशोधन संभव होगा।

फिलहाल दो संतान संबंधी करीब 25 साल पुराने प्रावधान को लेकर सरकार के भीतर ही प्रक्रिया पूरी न होने से राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा शुरू हो गई है।

मुख्यमंत्री ने नियम हटाने की मंशा जाहिर कर दी है, लेकिन अंतिम फैसला नियमों में संशोधन और कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही प्रभावी होगा। इसलिए फिलहाल मौजूदा नियम लागू हैं और दो से अधिक संतान वाले अभ्यर्थियों पर इससे जुड़ी पात्रता की शर्तें बनी हुई हैं।

अब देखना होगा कि सरकार इस पुराने प्रावधान को वास्तव में समाप्त करती है या प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया के चलते फैसला एक बार फिर लंबा खिंचता है।