15 जून से 3 अगस्त तक 50% भी नहीं हुई बारिश, खरीफ की फसल संकट में; बुंदेलखंड में सूखे जैसे हालात

जलाशय, तालाब और भूजल स्तर पर मंडरा रहा संकट

15 जून से 3 अगस्त तक 50% भी नहीं हुई बारिश, खरीफ की फसल संकट में; बुंदेलखंड में सूखे जैसे हालात

15 जून से 3 अगस्त तक सिर्फ 159.5 मिमी बारिश, पिछले साल से आधी भी नहीं

दो लाख हेक्टेयर में बोई गई खरीफ फसल पर सूखे का खतरा

मूंग, उड़द, तिल और मक्का की 70–80% फसल प्रभावित

ट्यूबवेल वाले किसान किसी तरह बचा रहे धान की फसल

उरई। बुंदेलखंड में इस बार मानसून किसानों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया है। जून के मध्य से शुरू हुए वर्षा सत्र में अब तक सामान्य से काफी कम बारिश होने के कारण खेतों में खड़ी खरीफ की फसलें सूखने लगी हैं। जालौन जिले में 15 जून से 3 अगस्त 2026 तक मात्र 159.5 मिमी वर्षा दर्ज की गई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक 368.5 मिमी बारिश हो चुकी थी। यानी इस बार अब तक आधे से भी कम बारिश हुई है। इसका सीधा असर खेती-किसानी पर दिखाई देने लगा है और किसान गंभीर चिंता में हैं।

जिले में इस वर्ष लगभग दो लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में खरीफ की बुआई की गई है। इसमें सबसे अधिक क्षेत्र धान की खेती का है, जबकि मूंग, उड़द, तिल और कुछ क्षेत्रों में मक्का की भी खेती की गई है। लगातार कमजोर बारिश के चलते इन फसलों पर संकट गहराता जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो अधिकांश खरीफ फसलों को बचा पाना मुश्किल होगा।

धान की फसल की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है क्योंकि धान की खेती प्रायः वही किसान करते हैं जिनके पास ट्यूबवेल या अन्य सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं। ऐसे किसान खेतों में पानी देकर फसल को किसी हद तक बचा सकते हैं। लेकिन मूंग, उड़द, तिल और मक्का जैसी वर्षा आधारित फसलें लगातार सूख रही हैं। किसानों का कहना है कि इन फसलों में 70 से 80 प्रतिशत तक नुकसान हो चुका है और यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो पूरी फसल चौपट हो सकती है।

मौसम विभाग पहले ही संकेत दे चुका था कि इस बार बुंदेलखंड में मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। अब तक के आंकड़े भी उसी ओर इशारा कर रहे हैं। सामान्य परिस्थितियों में इस अवधि तक बुंदेलखंड में करीब 350 मिमी वर्षा होनी चाहिए थी, लेकिन अब तक केवल लगभग 150 मिमी वर्षा दर्ज हुई है। यानी क्षेत्र में लगभग 57 प्रतिशत वर्षा की कमी बनी हुई है। यह केवल एक मौसम संबंधी आंकड़ा नहीं बल्कि खेती, पेयजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।

जालौन जिले की औसत वार्षिक वर्षा 862 मिमी मानी जाती है। हालांकि वर्ष 2025 में भी जिले में केवल 638.5 मिमी बारिश दर्ज की गई थी, जो सामान्य से कम थी। लगातार दूसरे वर्ष कमजोर मानसून ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। लगातार कम वर्षा के कारण खेतों की नमी खत्म होती जा रही है और कई स्थानों पर दरारें तक पड़ने लगी हैं।

खेती पर संकट के साथ-साथ जल संकट की आशंका भी गहराने लगी है। पर्याप्त बारिश नहीं होने से तालाब, झील, छोटे जलाशय और नदियां पूरी तरह नहीं भर पा रही हैं। इसका असर आने वाले महीनों में भूजल स्तर पर भी पड़ेगा। यदि यही स्थिति बनी रही तो गर्मियों में पेयजल संकट पहले से अधिक गंभीर हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में हैंडपंपों और कुओं का जलस्तर भी प्रभावित होने की आशंका है।

किसानों का कहना है कि उन्होंने महंगे बीज, खाद और डीजल पर भारी खर्च कर खेती की है। कई किसानों ने कर्ज लेकर बुआई की थी। अब यदि फसल नष्ट होती है तो उनकी आर्थिक स्थिति और खराब हो जाएगी। खेतों में खड़ी फसलें मुरझाने लगी हैं और किसान दिन-रात आसमान की ओर टकटकी लगाए बारिश का इंतजार कर रहे हैं।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के ताजा संकेत भी राहत देने वाले नहीं हैं। विभाग के अनुसार अगस्त में भी मानसून सामान्य से कमजोर रहने की संभावना है। सितंबर में भी बारिश औसत से कम रहने के संकेत मिल रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो अब तक हुई वर्षा की कमी की भरपाई होना बेहद कठिन होगा और खरीफ उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले एक-दो सप्ताह के भीतर अच्छी वर्षा नहीं हुई तो मूंग, उड़द, तिल और मक्का जैसी फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होगा। इसका असर किसानों की आय के साथ-साथ बाजार में दलहन और तिलहन की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।

किसानों ने शासन और प्रशासन से मांग की है कि यदि वर्षा की स्थिति में सुधार नहीं होता है तो जल्द से जल्द फसल सर्वे कराया जाए और प्रभावित किसानों को राहत पैकेज, बीमा क्लेम तथा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। साथ ही सिंचाई के वैकल्पिक साधनों और बिजली आपूर्ति को भी बेहतर बनाया जाए ताकि जिन किसानों के पास संसाधन हैं वे अपनी फसल बचा सकें।

बुंदेलखंड लंबे समय से सूखे और जल संकट की समस्या से जूझता रहा है। इस बार भी कमजोर मानसून ने क्षेत्र के किसानों की चिंता बढ़ा दी है। अब पूरे क्षेत्र की निगाहें आने वाले दिनों की बारिश पर टिकी हैं। यदि मानसून ने जल्द रफ्तार नहीं पकड़ी तो न केवल खरीफ की फसल बल्कि पेयजल, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक असर देखने को मिल सकता है। किसानों के लिए आने वाले कुछ सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।