राजहठ नहीं, लोकतांत्रिक मर्यादा एवं संगठन सर्वोपरि!
भोपाल। वरिष्ठ लेखक डॉ. इंदर सिंह केवट ने अपने लेख में लोकतंत्र में संगठनात्मक अनुशासन और सामूहिक निर्णय के महत्व पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में व्यक्ति से ऊपर संविधान, संगठन और सामूहिक निर्णय होते हैं। टिकट वितरण जैसे फैसलों को गरिमा के साथ स्वीकार करना ही परिपक्व राजनीतिक आचरण है।
डॉक्टर इंदर सिंह केवट
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस भोपाल मध्य प्रदेश
राजहठ नहीं, लोकतांत्रिक मर्यादा और संगठन सर्वोपरि : डॉ. इंदर सिंह केवट
लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं, संगठन और सामूहिक निर्णय सर्वोच्च
टिकट से बड़ा संगठन, अनुशासन ही सच्चे नेतृत्व की पहचान
वरिष्ठ नेताओं का दायित्व—संगठन के निर्णय का सम्मान करें
भारतीय लोकजीवन में एक प्रसिद्ध उक्ति है—"बालहठ, त्रियाहठ और राजहठ।" बालहठ मासूम जिद का प्रतीक है, त्रियाहठ भावनात्मक आग्रह का, जबकि राजहठ सत्ता, अहंकार अथवा अपने निर्णय पर किसी भी परिस्थिति में अडिग रहने की प्रवृत्ति का प्रतीक माना गया है। राजतंत्र के युग में राजहठ सामान्य बात हो सकती थी, परंतु लोकतंत्र में इसका स्थान सीमित है। यहाँ व्यक्ति से ऊपर संविधान, संगठन और सामूहिक निर्णय की व्यवस्था सर्वोपरि होती है।
लोकतांत्रिक राजनीति में टिकट वितरण, दायित्व निर्धारण और नेतृत्व परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। ऐसे निर्णय सदैव सभी की व्यक्तिगत अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होते, फिर भी संगठनात्मक अनुशासन की दृष्टि से उन्हें स्वीकार करना ही परिपक्व राजनीतिक आचरण माना जाता है।
हाल ही में मध्य प्रदेश की राजनीति में वरिष्ठ नेता एवं पूर्व गृह मंत्री **** को दतिया विधानसभा क्षेत्र से टिकट नहीं दिए जाने का निर्णय व्यापक चर्चा का विषय बना। ऐसे अवसर किसी भी वरिष्ठ नेता के लिए धैर्य, संयम और संगठन के प्रति निष्ठा की परीक्षा होते हैं। लोकतांत्रिक दलों में केंद्रीय नेतृत्व समय, परिस्थितियों और संगठनात्मक रणनीति को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। ऐसे में संगठन के निर्णय को गरिमा के साथ स्वीकार करना लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करता है।
इतना ही नहीं, किसी भी वरिष्ठ नेता की यह भी नैतिक और संगठनात्मक जिम्मेदारी होती है कि वे स्वयं सार्वजनिक रूप से संगठन के निर्णय का सम्मान करें तथा अपने कार्यकर्ताओं, समर्थकों और शुभचिंतकों से भी संयम बनाए रखने, अनुशासन का पालन करने और अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में पूरी निष्ठा से कार्य करने का आह्वान करें। यही व्यवहार संगठन की एकता को सुदृढ़ करता है और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
राजनीति में पद और टिकट स्थायी नहीं होते, लेकिन संगठन के प्रति समर्पण, अनुशासन और जनसेवा का भाव व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। इतिहास गवाह है कि जिन नेताओं ने कठिन परिस्थितियों में भी संगठन को स्वयं से ऊपर रखा, उन्हें समय ने पुनः सम्मान और दायित्व दोनों प्रदान किए।
लोकतंत्र का वास्तविक सौंदर्य राजहठ में नहीं, बल्कि लोकमत, संगठनात्मक अनुशासन और सामूहिक निर्णय के सम्मान में निहित है। व्यक्तिगत आकांक्षाएँ स्वाभाविक हैं, किंतु जब संगठन निर्णय ले चुका हो, तब उसे सहजता और गरिमा के साथ स्वीकार करना ही एक परिपक्व जननेता का परिचय है। साथ ही, समर्थकों को भी यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया जाना चाहिए कि संगठन और पार्टी का निर्णय सर्वोपरि होता है। यही लोकतांत्रिक संस्कृति, राजनीतिक शालीनता और संगठन की दीर्घकालीन शक्ति का वास्तविक आधार है
भोपाल भारतीय लोकजीवन में एक प्रसिद्ध उक्ति है—"बालहठ, त्रियाहठ और राजहठ।" बालहठ मासूम जिद का प्रतीक है, त्रियाहठ भावनात्मक आग्रह का, जबकि राजहठ सत्ता, अहंकार अथवा अपने निर्णय पर किसी भी परिस्थिति में अडिग रहने की प्रवृत्ति का प्रतीक माना गया है। राजतंत्र के युग में राजहठ सामान्य बात हो सकती थी, परंतु लोकतंत्र में इसका स्थान सीमित है। यहाँ व्यक्ति से ऊपर संविधान, संगठन और सामूहिक निर्णय की व्यवस्था सर्वोपरि होती है।
लोकतांत्रिक राजनीति में टिकट वितरण, दायित्व निर्धारण और नेतृत्व परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। ऐसे निर्णय सदैव सभी की व्यक्तिगत अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होते, फिर भी संगठनात्मक अनुशासन की दृष्टि से उन्हें स्वीकार करना ही परिपक्व राजनीतिक आचरण माना जाता है।
हाल ही में मध्य प्रदेश की राजनीति में वरिष्ठ नेता एवं पूर्व गृह मंत्री **** को दतिया विधानसभा क्षेत्र से टिकट नहीं दिए जाने का निर्णय व्यापक चर्चा का विषय बना। ऐसे अवसर किसी भी वरिष्ठ नेता के लिए धैर्य, संयम और संगठन के प्रति निष्ठा की परीक्षा होते हैं। लोकतांत्रिक दलों में केंद्रीय नेतृत्व समय, परिस्थितियों और संगठनात्मक रणनीति को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। ऐसे में संगठन के निर्णय को गरिमा के साथ स्वीकार करना लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करता है।
इतना ही नहीं, किसी भी वरिष्ठ नेता की यह भी नैतिक और संगठनात्मक जिम्मेदारी होती है कि वे स्वयं सार्वजनिक रूप से संगठन के निर्णय का सम्मान करें तथा अपने कार्यकर्ताओं, समर्थकों और शुभचिंतकों से भी संयम बनाए रखने, अनुशासन का पालन करने और अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में पूरी निष्ठा से कार्य करने का आह्वान करें। यही व्यवहार संगठन की एकता को सुदृढ़ करता है और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
राजनीति में पद और टिकट स्थायी नहीं होते, लेकिन संगठन के प्रति समर्पण, अनुशासन और जनसेवा का भाव व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। इतिहास गवाह है कि जिन नेताओं ने कठिन परिस्थितियों में भी संगठन को स्वयं से ऊपर रखा, उन्हें समय ने पुनः सम्मान और दायित्व दोनों प्रदान किए
लोकतंत्र का वास्तविक सौंदर्य राजहठ में नहीं, बल्कि लोकमत, संगठनात्मक अनुशासन और सामूहिक निर्णय के सम्मान में निहित है। व्यक्तिगत आकांक्षाएँ स्वाभाविक हैं, किंतु जब संगठन निर्णय ले चुका हो, तब उसे सहजता और गरिमा के साथ स्वीकार करना ही एक परिपक्व जननेता का परिचय है। साथ ही, समर्थकों को भी यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया जाना चाहिए कि संगठन और पार्टी का निर्णय सर्वोपरि होता है। यही लोकतांत्रिक संस्कृति, राजनीतिक शालीनता और संगठन की दीर्घकालीन शक्ति का वास्तविक आधार है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस