मोहन सरकार का बड़ा एक्शन: सरकारी खरीद में धांधली पर 392 अधिकारी-कर्मचारी नपे, 7 बर्खास्त; ठेकेदारों-सप्लायर्स पर भी कार्रवाई
मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी खरीद के GeM पोर्टल पर 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी में करीब 250 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता सामने आई है। इस मामले में अब तक 392 अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई है, जिनमें 7 बर्खास्त और 135 CMO भी शामिल हैं, साथ ही 80 ठेकेदार ब्लैकलिस्ट हुए हैं।
मध्य प्रदेश के मुख्य अवर सचिव संजय दुबे ने खुलासा किया कि शहरी निकायों यानी नगर निगम में करोड़ों के हेर-फेर और घोटाले हुए हैं. इनमें कुल 392 अधिकारियों के नाम हैं. इस मामले में 135 अधिकारियों के खिलाफ एक्शन लिया गया है. 7 अधिकारियों को बर्खास्त किया गया है. 3-4 करोड़ रुपए की वसूली भी हुई है. अन्य अधिकारियों पर निगरानी रखी जा रही है.
भोपाल। मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों में सरकारी खरीद के दौरान सामने आई वित्तीय अनियमितताओं को लेकर मोहन सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस यानी GeM पोर्टल के माध्यम से हुई खरीदी में दरों और भुगतान को लेकर गंभीर सवाल उठने के बाद नगरीय प्रशासन विभाग ने बड़े स्तर पर कार्रवाई की है। वर्ष 2023 से 2026 के बीच प्रदेश के नगरीय निकायों में करीब 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी का प्रारंभिक मूल्यांकन कराया गया। इस जांच में लगभग 250 करोड़ रुपये का अंतर या संभावित अनियमितता सामने आने के बाद विभाग ने कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है।
अब तक 392 अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। इनमें से 7 कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया है। वहीं, सरकारी खरीद में अनियमितता से जुड़े 80 ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं को काली सूची में डाल दिया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकायुक्त संगठन की विशेष स्थापना पुलिस ने भी जांच शुरू कर दी है।
1,134 करोड़ की खरीदी का हुआ प्रारंभिक मूल्यांकन
नगरीय निकायों में सफाई व्यवस्था, प्रकाश व्यवस्था, वाहनों और दूसरी आवश्यक वस्तुओं की खरीदी के लिए GeM पोर्टल का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार के स्तर पर जब अलग-अलग निकायों में खरीदी की दरों और भुगतान का तुलनात्मक परीक्षण कराया गया तो कई मामलों में कीमतों में बड़ा अंतर सामने आया।
विभाग की प्रारंभिक जांच में करीब 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी को परीक्षण के दायरे में लिया गया। इसमें लगभग 250 करोड़ रुपये की राशि को लेकर अंतर और संभावित गड़बड़ी सामने आई। हालांकि, यह अंतिम निष्कर्ष नहीं है। सरकार की ओर से पूरे मामले की विस्तृत जांच कराई जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि वास्तविक वित्तीय अनियमितता कितनी हुई और इसके लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं।
कहीं दो लाख का कचरा वाहन, कहीं छह लाख का खर्च
सरकारी खरीद में दरों के अंतर का एक उदाहरण अप्रैल 2026 में सामने आया था। अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने अधिकारियों की कार्यशाला में नगरीय निकायों की खरीद प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए अलग-अलग निकायों में सामने आए मूल्य अंतर का उल्लेख किया था।
उन्होंने बताया था कि एक निकाय में कचरा वाहन करीब दो लाख रुपये में खरीदा गया, जबकि दूसरे निकाय में चार डस्टबिन लगाने के लिए करीब छह लाख रुपये की खरीदी दिखाई गई। इस तरह के मामलों ने खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और वास्तविक कीमतों को लेकर सवाल खड़े किए।
सरकार ने इसके बाद अलग-अलग निकायों में खरीदी गई वस्तुओं की दरों, उनके भुगतान और संबंधित रिकॉर्ड की जांच शुरू कराई। अधिकारियों को यह भी देखना था कि क्या खरीद निर्धारित नियमों के तहत हुई या फिर कीमतों को बढ़ाकर सरकारी राशि का भुगतान किया गया।
306 रुपये की एलईडी लाइट 11,800 रुपये तक में
जांच के दौरान एलईडी लाइट की खरीद में भी चौंकाने वाला अंतर सामने आया। बाजार में करीब 306 रुपये कीमत वाली एलईडी लाइट की खरीदी कुछ नगरीय निकायों में 11,800 रुपये तक की दर पर दर्ज होने की बात सामने आई।
दर में इतने बड़े अंतर ने विभागीय स्तर पर खरीद प्रक्रिया की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके बाद खरीद आदेश, सप्लाई रिकॉर्ड, भुगतान और संबंधित दस्तावेजों की जांच शुरू की गई।
सरकार अब यह पता लगाने में जुटी है कि अलग-अलग निकायों में वस्तुओं की कीमतों में इतना अंतर किन परिस्थितियों में हुआ। इसके साथ ही यह भी जांचा जा रहा है कि कहीं नियमों का उल्लंघन कर किसी विशेष ठेकेदार या आपूर्तिकर्ता को लाभ तो नहीं पहुंचाया गया।
392 अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई
अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के अनुसार, सरकारी खरीद में अनियमितताओं के मामलों में अब तक 392 अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई की गई है। इनमें से 7 कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त किया जा चुका है।
अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ मामले की गंभीरता के अनुसार अलग-अलग विभागीय कार्रवाई की गई है। इनमें प्रतिकूल प्रविष्टि, वेतनवृद्धि रोकना और सरकारी राशि की वसूली जैसी कार्रवाई शामिल है।
इस कार्रवाई का असर नगरीय निकायों के कई स्तरों पर पड़ा है। खरीद प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया की भी जांच की जा रही है।
135 सीएमओ भी कार्रवाई के दायरे में
मामले में नगरीय निकायों के 135 मुख्य नगर पालिका अधिकारियों (CMO) की भूमिका भी जांच और कार्रवाई के दायरे में आई है। सीएमओ नगरीय निकायों में प्रशासनिक स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं, इसलिए खरीद प्रक्रिया से जुड़े मामलों में उनकी भूमिका भी जांची जा रही है।
सरकार का फोकस इस बात पर है कि नियमों के विपरीत खरीद या अधिक दर पर भुगतान की स्थिति में जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है। जिन मामलों में लापरवाही या अनियमितता साबित होगी, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
80 ठेकेदार और सप्लायर ब्लैकलिस्ट
सरकारी कार्रवाई सिर्फ अधिकारियों और कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। खरीद प्रक्रिया से जुड़े 80 ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं को काली सूची में डाल दिया गया है।
इन ठेकेदारों और सप्लायर्स की भूमिका को लेकर भी जांच की जा रही है। सरकार यह पता लगाने में जुटी है कि सामान की आपूर्ति किस दर पर हुई, बिल किस आधार पर पास किए गए और संबंधित निकायों ने भुगतान से पहले किन दस्तावेजों का परीक्षण किया।
ब्लैकलिस्ट की कार्रवाई से यह संकेत भी दिया गया है कि सरकारी खरीद में अनियमितता पाए जाने पर केवल विभागीय कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय नहीं होगी, बल्कि संबंधित निजी पक्षों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
लोकायुक्त ने भी शुरू की जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकायुक्त संगठन की विशेष स्थापना पुलिस ने भी जांच शुरू कर दी है। अब विभागीय जांच के साथ-साथ लोकायुक्त स्तर पर भी पूरे मामले के तथ्यों और संभावित वित्तीय अनियमितताओं की पड़ताल की जा रही है।
लोकायुक्त जांच में संबंधित दस्तावेज, खरीद प्रक्रिया, भुगतान और अधिकारियों की भूमिका जैसे पहलुओं की जांच की जा सकती है। शासन स्तर पर भी प्रदेश के नगरीय निकायों में हुई खरीद का विस्तृत परीक्षण कराया जा रहा है।
अब होगी विस्तृत जांच
सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना है कि प्रारंभिक जांच में सामने आया करीब 250 करोड़ रुपये का अंतर वास्तविक वित्तीय अनियमितता में कितना बदलता है। इसके लिए खरीद से जुड़े दस्तावेजों और भुगतान रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण किया जा रहा है।
जांच पूरी होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि किन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ, कहां अधिकारियों की लापरवाही रही और किन मामलों में ठेकेदारों या सप्लायर्स की भूमिका रही।
सरकार का कहना है कि जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। यदि किसी मामले में सरकारी राशि के दुरुपयोग या गंभीर वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होती है तो संबंधित जिम्मेदारों पर नियमानुसार और कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
खरीद प्रक्रिया पर बढ़ाई जा रही निगरानी
इस पूरे मामले के बाद नगरीय निकायों की सरकारी खरीद प्रक्रिया पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि GeM सहित अन्य माध्यमों से होने वाली खरीद में निर्धारित नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन हो।
खरीदी की दर, सप्लाई, बिल, भुगतान और संबंधित रिकॉर्ड को जांच के दायरे में रखा जा रहा है। सरकार यह भी देख रही है कि अलग-अलग निकायों में एक ही तरह की वस्तु के लिए अलग-अलग दर क्यों दर्ज हुई।
फिलहाल मामला विभागीय कार्रवाई, लोकायुक्त जांच और शासन स्तर पर चल रहे विस्तृत परीक्षण के बीच है। प्रारंभिक जांच में सामने आए आंकड़ों ने सरकारी खरीद की निगरानी पर जरूर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब विस्तृत जांच की रिपोर्ट से ही पता चलेगा कि कथित अनियमितता का वास्तविक आकार कितना है और इसमें किसकी कितनी जिम्मेदारी तय होती है।
मोहन सरकार की ओर से की गई कार्रवाई में 392 अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई, 7 बर्खास्तगी और 80 ठेकेदार-सप्लायर्स को ब्लैकलिस्ट किया जाना फिलहाल इस मामले का सबसे बड़ा अपडेट है। आगे की जांच के बाद कार्रवाई का दायरा और बढ़ सकता है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस