BJP सांसद हिमाद्री सिंह और नरेंद्र मरावी का 9 साल पुराना रिश्ता खत्म, आपसी सहमति से तलाक; 5 साल अलग रहने के बाद कोर्ट का फैसला
मध्यप्रदेश के शहडोल संसदीय क्षेत्र से दो बार की बीजेपी सांसद हिमाद्री सिंह का पति नरेंद्र सिंह मरावी का तलाक हो गया है. दोनों पिछले कई वर्षों से अलग-अलग रह रहे थे. कोर्ट ने तलाक के आवेदन पर निर्णय देते हुए डिक्री पारित कर दी है. दोनों की शादी 23 नवंबर 2017 को अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ में हुई थी. दोनों की एक बेटी गिरिशा कुमारी सिंह है, जो हिमाद्री के साथ रहती हैं.
शहडोल सांसद हिमाद्री सिंह का तलाक हो गया है। उनकी शादी बीजेपी नेता नरेन्द्र सिंह मरावी के साथ हुई थी। नरेन्द्र सिंह मरावी 2009 में हिमाद्री की मां से लोकसभा चुनाव हार गए थे।
शहडोल। शहडोल लोकसभा सीट से भाजपा सांसद हिमाद्री सिंह और नरेंद्र सिंह मरावी का वैवाहिक रिश्ता अब कानूनी रूप से समाप्त हो गया है। अनूपपुर जिले के राजेंद्रग्राम न्यायालय ने दोनों की आपसी सहमति से 3 सितंबर 2026 को विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर दी। दोनों का विवाह करीब नौ साल पहले 23 नवंबर 2017 को हिंदू रीति-रिवाज से राजेंद्रग्राम में हुआ था। हालांकि, वैवाहिक जीवन में विवाद बढ़ने के बाद दोनों मई 2021 से अलग रह रहे थे।
कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेजों के मुताबिक दोनों के बीच वैवाहिक संबंधों को सामान्य रूप से आगे बढ़ाना संभव नहीं रह गया था। दोनों पक्षों ने न्यायालय के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि अब पति-पत्नी के रूप में साथ रहना संभव नहीं है और वे अपनी इच्छा से विवाह विच्छेद चाहते हैं। मामले में किसी पक्ष की ओर से एक-दूसरे पर कोई विशेष आरोप भी नहीं लगाया गया।
2017 में हुआ था विवाह, 2019 में बेटी का जन्म
हिमाद्री सिंह और नरेंद्र सिंह मरावी का विवाह 23 नवंबर 2017 को राजेंद्रग्राम में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। विवाह के बाद दोनों कुछ समय तक साथ रहे। 20 जून 2019 को उनके यहां बेटी गिरिशा सिंह का जन्म हुआ।
शादी के कुछ समय बाद दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर मतभेद और विवाद शुरू होने लगे। समय के साथ ये विवाद बढ़ते गए और दोनों के बीच आपसी मेल-जोल कम होता गया। स्थिति ऐसी बनी कि दोनों ने अलग-अलग रहना शुरू कर दिया।
न्यायालय में रखे गए तथ्यों के अनुसार हिमाद्री सिंह और नरेंद्र सिंह मरावी 5 मई 2021 से अलग रह रहे थे। लंबे समय तक अलग रहने के बाद दोनों के बीच साथ रहने की संभावना लगभग समाप्त हो गई थी।
सुलह के लिए कोर्ट ने दिया छह महीने का समय
विवाह विच्छेद की प्रक्रिया के दौरान न्यायालय ने दोनों पक्षों को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने और यदि संभव हो तो दोबारा साथ आने का अवसर दिया। आपसी सहमति से तलाक के मामलों में न्यायालय की ओर से सुलह और पुनर्मिलन की संभावना को भी देखा जाता है।
कोर्ट ने दोनों को छह महीने का समय दिया। इस दौरान पुनर्मिलन की कोशिश की गई, लेकिन दोनों के बीच संबंधों में कोई सुधार नहीं हुआ। छह महीने की अवधि पूरी होने के बाद भी दोनों ने न्यायालय के सामने यही कहा कि वे पति-पत्नी के रूप में आगे साथ नहीं रह सकते।
दोनों पक्षों की सहमति और सुलह के प्रयास विफल होने के बाद न्यायालय ने विवाह विच्छेद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत तलाक
राजेंद्रग्राम न्यायालय ने दोनों पक्षों की पारस्परिक सहमति के आधार पर 3 सितंबर 2026 को विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की। यह आदेश हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13-बी के तहत पारित किया गया।
न्यायालय ने उपलब्ध तथ्यों और दोनों पक्षों के बयानों के आधार पर माना कि दोनों के लिए पति-पत्नी के रूप में साथ रहकर दाम्पत्य जीवन जारी रखना संभव नहीं है। इसके बाद कानूनी रूप से दोनों का वैवाहिक रिश्ता समाप्त हो गया।
बेटी गिरिशा मां हिमाद्री के साथ रहेगी
तलाक की प्रक्रिया के दौरान बेटी गिरिशा सिंह को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच सहमति बनी। कोर्ट में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार बेटी अपनी मां हिमाद्री सिंह के साथ रह रही है और आगे भी उनके साथ ही रहेगी।
बेटी के पालन-पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य में होने वाले वैवाहिक खर्च की जिम्मेदारी हिमाद्री सिंह की ओर से उठाने की बात कही गई है। हिमाद्री सिंह ने अपने और बेटी के लिए नरेंद्र सिंह मरावी से किसी तरह के भरण-पोषण या गुजारा भत्ते की मांग नहीं की।
वहीं, विवाह के दौरान दिए गए गिफ्ट्स और जेवरात को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच किसी तरह का विवाद नहीं बताया गया है।
नरेंद्र मरावी की भी रही है राजनीतिक पृष्ठभूमि
नरेंद्र सिंह मरावी की भी राजनीति में सक्रिय भूमिका रही है। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भाजपा की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर हिमाद्री सिंह के परिवार की राजनीति से भी जुड़ा रहा है।
नरेंद्र मरावी ने 2009 के लोकसभा चुनाव में हिमाद्री सिंह की मां राजेश नंदिनी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा था। हालांकि, इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इसके बाद नरेंद्र मरावी ने 2018 के विधानसभा चुनाव में हिमाद्री सिंह के गृह क्षेत्र पुष्पराजगढ़ विधानसभा सीट से भी चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भी उन्हें सफलता नहीं मिली। बाद में वे राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष पद पर भी रहे।
राजनीतिक हलकों में नरेंद्र मरावी की भूमिका को हिमाद्री सिंह के कांग्रेस से भाजपा में आने से भी जोड़कर देखा जाता रहा है।
2024 में टिकट की कोशिश की भी चर्चा
समय के साथ हिमाद्री सिंह का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। वे भाजपा की प्रमुख आदिवासी महिला नेताओं में शामिल हुईं और शहडोल लोकसभा सीट से सांसद बनीं। दूसरी ओर नरेंद्र मरावी की सक्रिय राजनीतिक भूमिका पहले की तुलना में सीमित होती गई।
दोनों के लंबे समय से अलग रहने के दौरान राजनीतिक गलियारों में उनके निजी रिश्ते को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं होती रही हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र सिंह मरावी के भाजपा से टिकट की कोशिश करने की चर्चाएं भी सामने आई थीं।
हालांकि, दोनों के वैवाहिक रिश्ते में अलगाव की वास्तविक वजह को लेकर सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई। कोर्ट के दस्तावेजों में भी किसी एक पक्ष पर कोई विशेष आरोप लगाए जाने की बात सामने नहीं आती है। दस्तावेजों में मुख्य रूप से दोनों के बीच वैवाहिक संबंध सामान्य रूप से जारी रखना संभव नहीं होने और आपसी सहमति से विवाह विच्छेद की बात दर्ज है।
करीब पांच साल अलग रहने के बाद कानूनी रूप से रिश्ता खत्म
हिमाद्री सिंह और नरेंद्र सिंह मरावी मई 2021 से अलग रह रहे थे। यानी तलाक की कानूनी डिक्री पारित होने से पहले दोनों करीब पांच साल से अलग-अलग रह रहे थे। इस लंबे अलगाव के बाद दोनों ने न्यायालय में अपनी सहमति से विवाह समाप्त करने का निर्णय लिया।
3 सितंबर 2026 को न्यायालय के आदेश के साथ करीब नौ साल पहले शुरू हुआ उनका वैवाहिक रिश्ता कानूनी रूप से समाप्त हो गया। मामले में दोनों पक्षों के बीच बेटी, भरण-पोषण और विवाह से जुड़े सामान को लेकर भी सहमति होने की बात सामने आई है।
फिलहाल, इस पूरे मामले में सार्वजनिक रूप से सामने आए तथ्यों के अनुसार तलाक आपसी सहमति से हुआ है। अलगाव की निजी वजहों को लेकर कोई आधिकारिक विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में राजनीतिक चर्चाओं या निजी कारणों को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय न्यायालय के रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों को ही आधार माना जाना उचित होगा।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस