आईएएस रिंकू सिंह राही ने आउटसोर्सिंग से लगने वाले वाहनों ने भारी भ्रष्टाचार और अनिमियता,आयुक्त से की जांच की मांग

जालौन में सरकारी वाहनों की आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर IAS रिंकू सिंह राही ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बिना व्यावसायिक पंजीकरण वाले वाहन के सरकारी इस्तेमाल, ड्राइवरों को कम भुगतान और टेंडर प्रक्रिया में कथित कमीशनखोरी का आरोप लगाते हुए श्रमायुक्त व परिवहन आयुक्त से जांच की मांग की है।

आईएएस रिंकू सिंह राही ने आउटसोर्सिंग से लगने वाले वाहनों ने भारी भ्रष्टाचार और अनिमियता,आयुक्त से की जांच की मांग

सरकारी वाहनों की आउटसोर्सिंग में भ्रष्टाचार का आरोप, IAS रिंकू सिंह राही ने आयुक्तों से मांगी जांच

उरई। जालौन में जॉइंट मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही ने सरकारी कामकाज के लिए आउटसोर्सिंग के जरिए लगाए जाने वाले वाहनों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि वाहन आउटसोर्सिंग की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी, भुगतान में अनियमितता और कमीशनखोरी जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं। इस संबंध में उन्होंने 31 अगस्त को संबंधित उच्चाधिकारियों को पत्र भेजकर पूरे मामले की व्यापक जांच कराने की मांग की है।

राही के पत्र के मुताबिक, डीएम कार्यालय में आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से उपलब्ध कराए गए एक वाहन की जांच के दौरान नियमों के उल्लंघन का मामला सामने आया। सरकारी कार्य में इस्तेमाल हो रहे इस वाहन का पंजीकरण व्यावसायिक श्रेणी में नहीं था। जबकि सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग के माध्यम से वाहन उपलब्ध कराने के लिए निर्धारित नियमों के तहत व्यावसायिक वाहन का पंजीकरण जरूरी माना जाता है। वाहन पर निजी वाहन के अनुरूप पंजीकरण होने के बावजूद उसका सरकारी कार्य में इस्तेमाल किए जाने को लेकर उन्होंने सवाल उठाए हैं।

वाहन की व्यवस्था पर उठाए सवाल

आईएएस रिंकू सिंह राही ने अपने पत्र में केवल एक वाहन की स्थिति तक मामला सीमित नहीं रखा, बल्कि आउटसोर्सिंग के जरिए सरकारी वाहनों की व्यवस्था की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि अगर नियमों के मुताबिक वाहन का व्यावसायिक पंजीकरण आवश्यक है तो बिना वैध व्यावसायिक पंजीकरण वाले वाहन को सरकारी कार्य में कैसे लगाया गया, इसकी जांच होनी चाहिए।

उन्होंने संबंधित अधिकारियों से यह भी स्पष्ट करने की मांग की है कि वाहन उपलब्ध कराने वाली एजेंसी के चयन की प्रक्रिया क्या थी, टेंडर में कौन-कौन सी शर्तें रखी गई थीं और उनका पालन किस स्तर पर किया गया। इसके साथ ही वाहन के भुगतान, चालक को मिलने वाले मानदेय और एजेंसी तथा वाहन मालिक के बीच होने वाली भुगतान व्यवस्था की भी जांच की जरूरत बताई गई है।

चालक को कम भुगतान का आरोप

राही ने आउटसोर्सिंग व्यवस्था में ड्राइवरों की स्थिति को लेकर भी गंभीर चिंता जताई है। उनके अनुसार, वाहन चलाने वाले चालक को महज करीब 6,000 रुपये प्रतिमाह दिए जा रहे थे। इतना ही नहीं, कई बार चालक को मिलने वाला भुगतान कई महीनों तक लंबित रहता था।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकारी विभाग की ओर से वाहन और चालक के लिए भुगतान किया जाता है, तो उसका वास्तविक लाभ वाहन मालिक और चालक तक कितना पहुंचता है। यदि एजेंसी और अन्य स्तरों पर कटौती के बाद चालक को बेहद कम राशि मिल रही है, तो यह पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।

टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल

आईएएस अधिकारी ने आउटसोर्सिंग के लिए होने वाली टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि कई मामलों में संविदाकार या एजेंसी वास्तविक सेवा प्रदाता और सरकारी विभाग के बीच बिचौलिए की भूमिका में आ जाते हैं। इससे कमीशन का खेल होने की संभावना बढ़ती है और इसका सीधा असर वाहन मालिक तथा चालक पर पड़ता है।

उनके मुताबिक, वाहन का वास्तविक मालिक वाहन उपलब्ध कराने के बावजूद भुगतान व्यवस्था में एजेंसी पर निर्भर रहता है, जबकि चालक को भी निर्धारित भुगतान समय पर नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है।

राही ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी धन से संचालित किसी भी व्यवस्था में यह स्पष्ट होना चाहिए कि विभाग किस एजेंसी को भुगतान कर रहा है, एजेंसी वाहन मालिक को कितना भुगतान कर रही है और चालक को वास्तविक रूप से कितना मानदेय प्राप्त हो रहा है। इन सभी बिंदुओं की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कहीं नियमों का उल्लंघन या वित्तीय अनियमितता तो नहीं हुई।

पहले भी नगर पालिका में जांच को लेकर चर्चा में रहे

आईएएस रिंकू सिंह राही इससे पहले भी जालौन में अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चा में रहे हैं। नगर पालिका परिषद उरई में जांच अधिकारी के तौर पर जिम्मेदारी संभालने के दौरान उन्होंने कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच के लिए करीब तीन वर्ष का रिकॉर्ड तलब किया था।

बताया गया है कि मामले की जांच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने नगर पालिका कार्यालय पहुंचकर संबंधित दस्तावेज भी अपने कब्जे में लिए थे। हालांकि, इसके अगले ही दिन उन्हें जांच अधिकारी के पद से हटा दिया गया था। उस समय भी रिंकू सिंह राही ने उच्चाधिकारियों को पत्र भेजकर अपनी आपत्ति और शिकायत दर्ज कराई थी।

अब सरकारी वाहनों की आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर उनके द्वारा उठाए गए सवालों ने एक बार फिर प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। हालांकि, जिन एजेंसियों या संबंधित लोगों पर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं, उनका पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

एक्स हैंडल पर भी जताई अपनी बात

आईएएस रिंकू सिंह राही ने मामले को लेकर अपने एक्स हैंडल पर भी टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा कि “भ्रष्टाचार रोक नहीं सकता, तो उसे उजागर कर ऑन रिकॉर्ड ला सकता हूं।” उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर चर्चा शुरू हो गई।

राही के रुख से साफ है कि वह सरकारी व्यवस्था में होने वाली कथित अनियमितताओं को रिकॉर्ड पर लाने और उनकी जांच कराने के पक्ष में हैं। उन्होंने संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र भेजकर मामले की जांच कराने की मांग की है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि वाहन आउटसोर्सिंग की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन हुआ या नहीं।

परिवहन और श्रम विभाग से जांच की मांग

आईएएस राही ने इस मामले में श्रमायुक्त और परिवहन आयुक्त को पत्र भेजा है। परिवहन विभाग से जहां वाहनों के पंजीकरण और उनके सरकारी कार्य में इस्तेमाल की वैधता से जुड़े पहलुओं की जांच की अपेक्षा है, वहीं श्रम विभाग के स्तर पर चालक और अन्य कर्मचारियों को मिलने वाले भुगतान तथा श्रम संबंधी नियमों के पालन की स्थिति सामने आ सकती है।

जांच में यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित एजेंसी, वाहन मालिक अथवा जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है। वहीं यदि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप पाई जाती है तो लगाए गए आरोपों की स्थिति भी स्पष्ट हो जाएगी।

जांच से सामने आ सकती है पूरी तस्वीर

आउटसोर्सिंग व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी विभागों को निर्धारित शर्तों के तहत आवश्यक वाहन और चालक उपलब्ध कराना है। लेकिन इस व्यवस्था में यदि टेंडर प्रक्रिया, वाहन के पंजीकरण, भुगतान और चालक के मानदेय से जुड़े नियमों का सही तरीके से पालन नहीं होता है तो सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

फिलहाल आईएएस रिंकू सिंह राही द्वारा उठाए गए सवालों के बाद अब निगाहें श्रमायुक्त और परिवहन आयुक्त की जांच पर टिकी हैं। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि डीएम कार्यालय में लगाए गए वाहन के पंजीकरण से संबंधित नियमों का उल्लंघन किस स्तर पर हुआ और आउटसोर्सिंग व्यवस्था में भुगतान तथा टेंडर से जुड़ी शिकायतों में कितनी सच्चाई है।

यदि व्यापक जांच होती है तो इसमें केवल एक वाहन के दस्तावेज ही नहीं, बल्कि आउटसोर्सिंग एजेंसी के चयन, टेंडर की शर्तों, उपलब्ध कराए गए सभी वाहनों के पंजीकरण, भुगतान रिकॉर्ड, चालक के मानदेय और एजेंसी को किए गए सरकारी भुगतान की भी जांच की जा सकती है। इससे पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही की वास्तविक तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।