नितिन नवीन के रथ से महापौर को उतारने पर गरमाई राजनीति: टटवाल बोले- ‘प्रथम नागरिक का अपमान’, 20 सितंबर को अंबेडकर प्रतिमा के सामने करेंगे मौन प्रदर्शन

उज्जैन में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के रोड शो के दौरान महापौर मुकेश टटवाल को रथ से उतारे जाने का मामला तूल पकड़ रहा है। टटवाल ने 20 सितंबर को अंबेडकर प्रतिमा के सामने मौन धरना देने का ऐलान किया है। वहीं कांग्रेस ने भी इस मामले पर भाजपा को घेरा है।

नितिन नवीन के रथ से महापौर को उतारने पर गरमाई राजनीति: टटवाल बोले- ‘प्रथम नागरिक का अपमान’, 20 सितंबर को अंबेडकर प्रतिमा के सामने करेंगे मौन प्रदर्शन

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उज्जैन आगमन पर आयोजित भव्य रथ यात्रा के दौरान पार्टी की अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है।

उज्जैन में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के रोड-शो के दौरान महापौर मुकेश टटवाल को रथ से उतारे जाने का मामला अब राजनीतिक विवाद में बदलता नजर आ रहा है। घटना के बाद महापौर टटवाल ने सार्वजनिक रूप से विरोध का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि वे 20 सितंबर को सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक फ्रीगंज स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने मौन बैठकर विरोध जताएंगे।

महापौर का कहना है कि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अगवानी के लिए हेलीपैड पहुंचे थे। उनका आरोप है कि भाजपा के जिला प्रभारी बजरंग पुरोहित और कार्यक्रम प्रभारी जयपाल सिंह चावड़ा ने उन्हें रोड-शो के रथ में बैठने के लिए कहा था। इसके बाद वे विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा के साथ रथ पर सवार हुए, लेकिन कुछ ही देर बाद उन्हें रथ से नीचे उतरने के लिए कहा गया।

टटवाल ने कहा कि वे इस पूरे घटनाक्रम से आहत हैं। उन्होंने कहा कि वे बाबा साहेब अंबेडकर की प्रतिमा के सामने बैठकर अपमान सहन करने की शक्ति मांगेंगे, ताकि इसके बावजूद जनता के लिए अच्छे से अच्छा काम कर सकें।

बेरवा समाज की बैठक में भी उठा मामला

महापौर के साथ हुए व्यवहार को लेकर शुक्रवार को संत बालीनाथ मंदिर, बागपुरा में बेरवा समाज की बैठक आयोजित हुई। बैठक में घटनाक्रम पर चर्चा की गई और महापौर के साथ हुए व्यवहार की निंदा की गई। बैठक में 20 सितंबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन को समर्थन देने का निर्णय लिया गया।

महापौर टटवाल ने बैठक में पूरे घटनाक्रम की जानकारी समाज के लोगों को दी। उन्होंने बताया कि शहर के प्रथम नागरिक होने के नाते वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की अगवानी के लिए हेलीपैड पहुंचे थे। उनका कहना है कि कार्यक्रम में उनकी भूमिका को लेकर उन्हें रथ पर सवार होने के लिए कहा गया था।

टटवाल के मुताबिक, वे विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा के साथ रथ पर चढ़े। हालांकि, कुछ समय बाद उन्हें रथ से नीचे उतरने के लिए कहा गया। महापौर ने इसी घटनाक्रम को अपने पद की अवहेलना और अपमान से जोड़ते हुए विरोध का निर्णय लिया है।

प्रोटोकॉल सूची को लेकर भी सवाल

विवाद के बीच रोड-शो के दौरान रथ पर सवार होने वाले नेताओं की प्रोटोकॉल सूची को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सामने आई जानकारी के अनुसार हेलीपैड से रथ पर सवार होने वाले नेताओं की सूची में महापौर मुकेश टटवाल का नाम नहीं था। वहीं, शिप्रा तट पर आयोजित कार्यक्रम के मंच की सूची में उनका नाम शामिल था।

इस पर महापौर ने कहा कि उन्हें प्रोटोकॉल सूची की जानकारी नहीं थी। उनका कहना है कि उन्हें यह बताया गया था कि उन्हें रथ पर सवार होना है, लेकिन बाद में रथ से उतार दिया गया।

रोड-शो के दौरान रथ पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, प्रभारी मंत्री गौतम टेटवाल, सांसद अनिल फिरोजिया, विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा और नगर अध्यक्ष संजय अग्रवाल मौजूद थे।

यही वजह है कि रथ से महापौर के उतरने का घटनाक्रम अब भाजपा के भीतर भी चर्चा का विषय बन गया है। मामला केवल कार्यक्रम की व्यवस्था से जुड़ा था या इसके पीछे कोई अन्य कारण था, इसे लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।

‘बाबा साहेब की प्रतिमा के सामने बैठूंगा’

महापौर टटवाल ने अपने विरोध के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने बैठने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि 20 सितंबर को वे सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक मौन रहेंगे।

टटवाल का कहना है कि उनका विरोध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि वे अपने पद के साथ हुए व्यवहार के विरोध में यह कदम उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे बाबा साहेब की प्रतिमा के सामने बैठकर ऐसी परिस्थितियों में काम करने की शक्ति मांगेंगे।

महापौर ने यह भी कहा कि लगातार उनके पद की अवहेलना और अपमान की घटनाएं सामने आ रही हैं। उनका कहना है कि इन परिस्थितियों के बावजूद वे जनता के हित में काम करते रहना चाहते हैं।

कांग्रेस ने साधा भाजपा पर निशाना

मामला सामने आने के बाद कांग्रेस ने भी भाजपा पर हमला बोला है। तराना विधायक महेश परमार ने इस घटनाक्रम को लेकर भाजपा पर सवाल खड़े किए।

महेश परमार ने कहा कि घटना से भाजपा के कथित दलित विरोधी रवैये को लेकर सवाल उठते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कार्यक्रम में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय से जुड़े कई नेता मौजूद थे, लेकिन उन्होंने महापौर के साथ हुए व्यवहार का विरोध नहीं किया।

परमार ने कहा कि यह केवल बेरवा समाज से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि उज्जैन के प्रथम नागरिक के सम्मान से जुड़ा विषय है। उन्होंने महापौर से माफी मांगे जाने की मांग की और घटनाक्रम की निंदा की।

हालांकि, कांग्रेस के इन आरोपों पर भाजपा की ओर से क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है, यह भी इस विवाद में महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल विवाद का केंद्र महापौर को रथ से उतारे जाने की घटना और उससे जुड़े प्रोटोकॉल को लेकर उठ रहे सवाल हैं।

20 सितंबर के प्रदर्शन पर नजर

महापौर द्वारा घोषित प्रदर्शन के बाद अब 20 सितंबर का दिन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। फ्रीगंज में डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने होने वाले मौन प्रदर्शन में बेरवा समाज के समर्थन की बात कही गई है।

इस प्रदर्शन के जरिए महापौर अपने पद और सम्मान से जुड़े मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाने जा रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा संगठन की ओर से इस पूरे घटनाक्रम को लेकर क्या स्पष्टीकरण दिया जाता है, इस पर भी राजनीतिक नजरें रहेंगी।

रोड-शो जैसे बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों में नेताओं की मौजूदगी और बैठने की व्यवस्था आम तौर पर पहले से तय होती है। ऐसे में रथ पर कौन-कौन सवार होगा और किसका नाम प्रोटोकॉल सूची में शामिल है, यह विवाद का अहम हिस्सा बन गया है।

फिलहाल महापौर का कहना है कि उन्हें रथ पर बैठने के लिए कहा गया था और बाद में उतारा गया। वहीं उपलब्ध प्रोटोकॉल जानकारी में हेलीपैड से रथ पर सवार होने वाले नेताओं की सूची में उनका नाम नहीं होने की बात सामने आई है। इसी अंतर ने पूरे मामले को और चर्चा में ला दिया है।

उज्जैन की राजनीति में यह विवाद अब केवल रोड-शो की व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। महापौर के सार्वजनिक विरोध के ऐलान, बेरवा समाज की बैठक और कांग्रेस के हमले के बाद मामला राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है। अब 20 सितंबर को होने वाले मौन प्रदर्शन और उसके बाद भाजपा संगठन की प्रतिक्रिया से इस विवाद की अगली तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।