छह साल तक अफसरों की फाइलों में अटका सम्मान, आखिर हाईकोर्ट के आदेश के बाद मिला हक-शिक्षा विभाग की मनमानी भी नहीं रोक पाई प्रतिभावान शिक्षिका अजीता द्विवेदी का सम्मान, 5 सितंबर को राज्यपाल ने किया पुरस्कृत

सीधी जिले की शिक्षिका अजीता द्विवेदी को छह साल के संघर्ष के बाद शिक्षक दिवस पर राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान मिला। वर्ष 2020 में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए उनका चयन हुआ था, लेकिन एक शिकायत के बाद पुरस्कार रोक दिया गया। जिला शिक्षा अधिकारी ने उनके चयन को सही बताया, इसके बावजूद मामला वर्षों तक लंबित रहा। शिक्षिका ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उन्हें पुरस्कार के लिए पात्र माना गया। इसके बाद 5 सितंबर 2026 को राज्यपाल मंगूभाई पटेल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उन्हें अन्य शिक्षकों के साथ सम्मानित किया।

छह साल तक अफसरों की फाइलों में अटका सम्मान, आखिर हाईकोर्ट के आदेश के बाद मिला हक-शिक्षा विभाग की मनमानी भी नहीं रोक पाई प्रतिभावान शिक्षिका अजीता द्विवेदी का सम्मान, 5 सितंबर को राज्यपाल ने किया पुरस्कृत

2020 में चयन के बाद पुरस्कार हुआ था होल्ड, न्यायालय ने माना पात्र; 2026 में 33 शिक्षकों के साथ दिया सम्मान

भोपाल।शिक्षक दिवस पर जब प्रदेश के प्रतिभावान शिक्षकों को उनके नवाचार और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए सम्मानित किया गया, तब सीधी जिले की शिक्षिका अजीता द्विवेदी की कहानी इस समारोह के बीच शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यह सिर्फ एक पुरस्कार मिलने की कहानी नहीं है, बल्कि उस सम्मान के लिए छह साल तक चले संघर्ष की कहानी है, जो उन्हें उनके काम के आधार पर पहले ही मिल जाना चाहिए था।
5 सितंबर को राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार समारोह में राज्यपाल  मंगूभाई पटेल एवं मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने 35 शिक्षकों को सम्मानित किया उनमें अजीता द्विवेदी का नाम भी शामिल है। खास बात यह है कि छह साल पहले जिस पुरस्कार के लिए उनका चयन हुआ था, वही सम्मान एक शिकायत के बाद रोक दिया गया था। मामला न्यायालय तक पहुंचा और हाईकोर्ट ने उन्हें पुरस्कार के लिए पात्र माना। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर मामला वर्षों तक लटका रहा।

शिकायत हुई और रोक दिया गया सम्मान :

मामला वर्ष 2020 का है। सीधी जिले की प्रतिभावान शिक्षिका अजीता द्विवेदी का चयन राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए हुआ था। लोक शिक्षण संचालनालय की राज्य स्तरीय सूची में उनका नाम शामिल था। इसी दौरान सीधी के तत्कालीन विधायक केदारनाथ शुक्ला के रिश्तेदार शिक्षक सतीश कुमार पांडे की ओर से उनके चयन को लेकर शिकायत की गई।
शिकायत के बाद लोक शिक्षण संचालनालय ने उनका पुरस्कार होल्ड कर दिया और जिला शिक्षा अधिकारी, सीधी से चयन के संबंध में जवाब मांगा। हैरानी की बात यह रही कि जिला शिक्षा अधिकारी ने विभाग को भेजे जवाब में अजीता द्विवेदी के चयन को सही बताया।
यानी जिले से विभाग को यह स्पष्ट कर दिया गया कि चयन में कोई गलत बात नहीं है। फिर सवाल यह है कि जब विभागीय जांच में चयन सही पाया गया तो पुरस्कार आखिर क्यों अटका रहा?

*न्यायालय ने माना पात्र, फिर भी वर्षों तक इंतजार :*

जब मामला लंबे समय तक लंबित रहा तो शिक्षिका अजीता द्विवेदी को अपने अधिकार के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई। सुनवाई के बाद न्यायालय ने उन्हें पुरस्कार के लिए पात्र माना।यहीं से शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब न्यायालय ने पात्रता पर मुहर लगा दी तो विभाग को सम्मान देने में आखिर किस बात की हिचक थी?
एक शिक्षिका, जिसने बच्चों की शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए अपने स्तर पर नवाचार किए, उसे अपने ही विभाग से मिलने वाले सम्मान के लिए वर्षों तक दफ्तरों और अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़े। जिस पुरस्कार को शिक्षक के काम की पहचान बनना था, वह उसके लिए संघर्ष और इंतजार का कारण बन गया।

*आदेश के बाद भी फाइल क्यों नहीं चली? :*

हाईकोर्ट के निर्णय के बाद भी यदि किसी शिक्षक को अपने सम्मान के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़े तो यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल है। शिक्षा विभाग के अफसरों के पास नियम हैं, जांच की व्यवस्था है और निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी। लेकिन इस मामले में सवाल यह है कि एक बार न्यायालय का निर्णय आने के बाद भी संबंधित शिक्षिका को उनका सम्मान पाने के लिए इतनी लंबी लड़ाई क्यों लड़नी पड़ी? क्या किसी अधिकारी की नाराजगी, विभागीय जिद या फाइलों की लालफीताशाही न्यायालय के आदेश से बड़ी हो सकती है? शिक्षिका अजीता द्विवेदी का संघर्ष बताता है कि कभी-कभी शिक्षक को बच्चों को पढ़ाने से ज्यादा मुश्किल अपने अधिकार के लिए विभागीय व्यवस्था से लड़ना पड़ता है।

*नवाचारों के लिए जानी जाती हैं अजीता :*

शिक्षिका अजीता द्विवेदी की पहचान सिर्फ एक पुरस्कार पाने वाली शिक्षिका के रूप में नहीं है। वे बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए स्थानीय और आसानी से उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल करते हुए कई नवाचार करती रही हैं। उन्होंने नीम के फूल, पिस्ता के छिलके जैसी सामान्य वस्तुओं से रंगोली बनाकर बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ावा दिया। बच्चों को नाम लिखना, अक्षर ज्ञान और गिनती सिखाने के लिए भी अलग-अलग गतिविधियों का सहारा लिया। यहां तक कि माचिस की तीलियों, कंकड़ और पत्थरों जैसी साधारण चीजों को भी उन्होंने बच्चों की पढ़ाई का माध्यम बनाया। इन प्रयोगों का उद्देश्य बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा करना रहा। ऐसे नवाचार खासकर उन बच्चों के लिए उपयोगी हैं, जिनके लिए पारंपरिक तरीके से पढ़ाई करना आसान नहीं होता।

*पुरस्कार से ज्यादा बड़ी है संघर्ष की जीत :*

इस बार 5 सितंबर को जब शिक्षिका अजीता द्विवेदी ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री के हाथों सम्मान लिया, तो मंच पर मिलने वाला पुरस्कार केवल एक प्रशस्ति-पत्र या सम्मान नहीं था। उसके पीछे छह साल का संघर्ष, विभागीय उपेक्षा और न्यायालय तक पहुंचने की पीड़ा भी थी। यह सवाल भी अपनी जगह कायम रहेगा कि यदि एक प्रतिभावान शिक्षिका का चयन 2020 में सही था, जिला शिक्षा अधिकारी ने भी चयन को सही बताया था और बाद में हाईकोर्ट ने भी उन्हें पात्र माना, तो उन्हें अपना सम्मान पाने के लिए 2026 तक इंतजार क्यों करना पड़ा?
शिक्षक दिवस पर सरकार और शिक्षा विभाग को ऐसे मामलों से सिर्फ पुरस्कार की सूची नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही भी देखनी चाहिए। क्योंकि किसी शिक्षक को सम्मान देना केवल मंच पर बुलाकर पुरस्कार देना नहीं है। उसके काम का समय पर सम्मान करना और उसके अधिकार के लिए उसे वर्षों तक सरकारी दफ्तरों में भटकने से बचाना भी व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अजीता द्विवेदी आखिरकार सम्मानित हुई, लेकिन उनकी छह साल की लड़ाई शिक्षा विभाग के सामने एक तीखा सवाल छोड़ जाती है—क्या न्याय पाने के बाद भी अपने ही अधिकार के लिए शिक्षक को छह साल तक इंतजार करना पड़ेगा?